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थारू भाषाको कविता : डेरा ओ देउता

शनिबार, १७ मंसिर २०७९, ०७ : ५८
शनिबार, १७ मंसिर २०७९

पहिले 
जब जब मै निक्रुँ
कोनो यात्रामे
अचानक डगरेमका
मन्दिरके साम्ने
हाँठ डुवा करक लग उठे
हे देउता, मोर आजुक यात्रा
सफल करहो । 
मै सहरमे बैठ्ठुँ
ओहेसे यहाँ, ठरवाना, मरवा
कहुँ नै भेटैलुँ
सोच्लुँ महि रक्षा करुइया
देउता जब नै हुइट
इ सहरमे 
मै कसिक सुरक्षित रहम् ?

मोर मेनम 
प्रश्नके भुइँचाल उठल
का सहरमे फेन
मरुवा स्ठापना
करे नै सेक्जाइ ?
डेरा जिन्दगीमे
मरुवाके स्ठापना ?
इ डुरके बात हो
इ केवल सपना हो
पूरा नै हुइना सपना
टै छोरडे । 
मने तुरुन्त समस्यक्
समाढान भेटाके
मै डंग पर्ठु
सायड गुर्बावा मोर मनेम 
पैंठके कहलाँ 
अपन डेरक् एक कोन्वम
डेहुरार काजे नै बनैठे ?
हजुर, 
आजकाल, मै अपन डेरक्
एक कोन्वाहे
डेहुरार मान्ले बटुँ
आब जब जब निकरठुँ
मै यात्रामे
डेरक डेहुरार मानल
कोन्वा ओर झुक्के
डुवा मंगठुँ
अई गुर्वावा,
मोर आजुक यात्रा
सफल करहो ।
सहरिया बाबु लोग
पशुपति, गुहेश्वरीक्
चक्कर कट्नासे
का अपनेन्के मोर पद्चिन्ह
पछ्यइयक नै चहबि ?
आई डेरक् एक कोन्वा ओर
डेहुरार बनाई । 
डेहुरार बनाई ।।

(विद्युतकर्मी साहित्यिक समाजद्वारा काकाडौंमा शुक्रबार आयोजित बहुभाषिक काव्य गोष्ठीमा वाचित कविता । डेराको साँगुरो कोठामा बसे पनि देउताप्रति आस्था जगाउने एउटा कुना छुट्याउनुपर्ने भाव कविताले बोकेको छ।)

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कृष्णराज सर्वहारी
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